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तीन अल्लाह के दोस्त (वली) ने एक साथ नमाज़ पढ़ी

तीन अल्लाह के दोस्त (वली) ने एक साथ नमाज़ पढ़ी

दिल्ली की रूहानी सरज़मीं पर बसी एक खास जगह – औलिया मस्जिद महरौली। जहां तीन बड़ें वली – हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, हज़रत बाबा फरीद और हज़रत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी – ने एक साथ नमाज़ अदा की थी। कहा जाता है, आज भी इस जगह की फिजा में रूहानी सुकून घुला हुआ है। आज हम आपको लेकर चलेंगे औलिया मस्जिद महरौली की उसी मुक़द्दस ज़मीन की सैर पर – जहाँ सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि अल्लाह के वलीयों की रूहानी मौजूदगी महसूस होती है।

औलिया मस्जिद – नाम ही बताता है रूहानी ताक़त

‘औलिया’ यानी अल्लाह के प्यारे बंदे, वो वली जिनसे खुदा का नूर झलकता है। दिल्ली के महरौली इलाके में स्थित इस मस्जिद को औलिया मस्जिद कहा जाता है क्योंकि यहां तीन महान सूफी संतों के कदम पड़े। यही वजह है कि यह मस्जिद सिर्फ एक इबादतगाह नहीं, बल्कि एक इतिहास, एक वाक़्या, और एक रूहानी निशानी है।

Auliya-Masjid

वो मुक़द्दस लम्हा जब तीन वली एक साथ थे

माना जाता है कि एक समय हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, हज़रत बाबा फरीद के साथ हज़रत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की ज़ियारत के लिए महरौली आए थे। उसी दौरान ये तीनों अल्लाह के वली औलिया मस्जिद में एक साथ इकट्ठा हुए। वहीं पर उन्होंने एक ही सफ में खड़े होकर नमाज़ अदा की। सोचिए, उस वक़्त की रूहानियत कैसी रही होगी – जब तीनों महान सूफी संत एक साथ अल्लाह की बारगाह में सर झुकाए खड़े थे। आज भी यह जगह लोगों के दिलों में एक जिंदा चमत्कार और रूहानी निशानी की तरह बसती है।

कैसे पहुंचे औलिया मस्जिद?

लोकेशन: महरौली, कुतुब मीनार के पास, दक्षिण दिल्ली।

मेट्रो से:
  • नज़दीकी मेट्रो स्टेशन: कुतुब मीनार मेट्रो स्टेशन (येलो लाइन)

  • वहां से ऑटो या पैदल 10 मिनट की दूरी

बस से:
  • DTC की बसें महरौली तक आती हैं।
  • नजफगढ़, बदरपुर, या आईएसबीटी से सीधी बस सेवा उपलब्ध है।
कार या बाइक से:
  • गूगल मैप में “Auliya Masjid, Mehrauli” सर्च करें।

रूहानियत से जुड़ने का मौका

अगर आप भी उन जगहों की तलाश में हैं जहाँ अल्लाह के नेक बंदों के कदम पड़े हों, तो औलिया मस्जिद आपके लिए सबसे सही जगह है। यहां आकर आप न सिर्फ इतिहास को महसूस कर सकते हैं, बल्कि अपनी रूह को भी सुकून दे सकते हैं।

औलिया मस्जिद सिर्फ एक पुरानी मस्जिद नहीं है, यह दिल्ली की रूहानियत का दिल है। जहां एक बार तीन अल्लाह के वली एक साथ खड़े हुए थे, वहाँ जाकर सिर्फ नमाज़ नहीं पढ़ी जाती, वहां रूह का रिश्ता जोड़ा जाता है।

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