दिल्ली का पहला शहर: मेहरौली और उसके किले – लाल कोट से क़िला राय पिथौरा तक
क्या आप जानते हैं कि दिल्ली का पहला शहर कौन-सा था? आज हम आपको ले चलेंगे एक ऐसे सफर पर, जहाँ से दिल्ली का इतिहास शुरू हुआ था। हम बात कर रहे हैं मेहरौली की, जो दिल्ली का सबसे पुराना इलाका है। यहीं पर बना था पहला किला – लाल कोट, और बाद में उसका विस्तार हुआ क़िला राय पिथौरा के रूप में। इस ब्लॉग में आप जानेंगे इन दोनों ऐतिहासिक किलों की अनसुनी कहानियाँ, उनके बचे हुए हिस्सों को आज कहाँ देखा जा सकता है और वहाँ पहुँचने का सही रास्ता क्या है। अगर आप इतिहास में दिलचस्पी रखते हैं या दिल्ली को एक नए नजरिए से देखना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए है।
दिल्ली की शुरुआत कहाँ से हुई?
आज जिसे हम दिल्ली कहते हैं, वह कई परतों में बसी हुई एक ऐतिहासिक नगरी है। लाल किला, कुतुब मीनार, इंडिया गेट जैसी इमारतें इसकी पहचान बन चुकी हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दिल्ली का पहला शहर कहाँ था? जी हाँ, दिल्ली का सबसे पहला बसेरा था मेहरौली। यहीं बना था दिल्ली का सबसे पुराना किला – लाल कोट, और बाद में उसका विस्तार हुआ क़िला राय पिथौरा के रूप में। आज इन किलों की सिर्फ कुछ दीवारें ही बाकी हैं, लेकिन उन पत्थरों में आज भी इतिहास की साँसें बसी हैं।
लाल कोट का निर्माण 11वीं सदी में तोमर वंश के राजा अनंगपाल तोमर द्वितीय ने कराया था। यह किला लगभग 1052 ईस्वी में बनकर तैयार हुआ और इसे “लाल कोट” इसलिए कहा गया क्योंकि इसके निर्माण में लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया था। लाल कोट को दिल्ली का सबसे पहला और पुराना किला माना जाता है। इसे उस समय की सुरक्षा के लिए बनाया गया था ताकि दुश्मनों से बचाव हो सके। इस किले के चारों तरफ ऊँची-ऊँची दीवारें और पहरे के लिए बुर्ज (चौकी) बनाए गए थे। यह किला उस ज़माने में बहुत मज़बूत था
लाल कोट की दीवारें आज कहाँ देख सकते हैं?
दिल्ली के महरौली में बना संजय वन एक बड़ा और घना जंगल है। यहाँ आज भी आपको लाल कोट की लंबी और मोटी दीवारें देखने को मिल जाएंगी। इन दीवारों के पास कुछ ऐसे पुराने निशान भी हैं, जो उस समय के किले के दरवाज़ों की तरफ़ इशारा करते हैं। ये निशान हमें बताते हैं कि कभी यहाँ से किले में अंदर जाने का रास्ता हुआ करता था।
क़िला राय पिथौरा: बढ़ते साम्राज्य और लड़ाइयों की कहानी
राय पिथौरा कौन थे?
राय पिथौरा, जिन्हें हम पृथ्वीराज चौहान के नाम से जानते हैं, एक बहादुर और ताक़तवर हिन्दू राजा थे। उन्होंने दिल्ली के लाल कोट किले को और बड़ा और मजबूत बनवाया। इसी वजह से इस किले को बाद में क़िला राय पिथौरा कहा जाने लगा।
इतिहास में क़िला राय पिथौरा क्यों ज़रूरी है?
जब पृथ्वीराज चौहान ने दिल्ली जीती, तो यहाँ पहले से बना हुआ किला लाल कोट उनके कब्ज़े में आ गया। इसके बाद उन्होंने इस किले को और बड़ा और मजबूत बनवाया। इसी का नाम बाद में पड़ा – क़िला राय पिथौरा। Wikipedia ये किला उस समय बहुत जरूरी था क्योंकि यहीं से पृथ्वीराज चौहान अपना राज चलाते थे और लड़ाइयों की तैयारी करते थे। बाद में मुहम्मद गोरी ने इसे जीत लिया।
आज क़िला राय पिथौरा के हिस्से कहाँ-कहाँ देखे जा सकते हैं?
क़िला राय पिथौरा के कुछ हिस्से आज भी अलग-अलग जगहों पर फैले हुए हैं। इनमें से कुछ दीवारें आपको संजय वन, साकेत और मालवीय नगर के पास भी देखने को मिल जाएंगी। ये दीवारें उस समय की याद दिलाती हैं जब यह किला बहुत बड़ा और मजबूत हुआ करता था।
दिल्ली सल्तनत की शुरुआत: लाल कोट से ग़ुलाम वंश तक का सफर
जब मुहम्मद गोरी ने तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को हराया, तो दिल्ली की बागडोर उसके हाथ में आ गई। लेकिन वो खुद ज्यादा समय तक भारत में नहीं रह सका। ऐसे में उसने अपने सबसे वफादार गुलाम सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का जिम्मा सौंपा। कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली के ऐतिहासिक लाल कोट और क़िला राय पिथौरा से ही अपनी हुकूमत की शुरुआत की। यहीं से उसने शासन चलाया और भारत में मुस्लिम सत्ता के पहले राजवंश – ग़ुलाम वंश (Slave Dynasty) की नींव रखी। यही वंश आगे चलकर दिल्ली सल्तनत बना, जिसने कई शताब्दियों तक उत्तर भारत की राजनीति और संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया। यह वही स्थान था जहाँ से हिंदू राजाओं के युग का अंत हुआ और एक नए इतिहास की शुरुआत हुई — एक ऐसा इतिहास, जिसमें दिल्ली बार-बार बनती और बिखरती रही।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो साफ दिखता है कि दिल्ली की असली शुरुआत यहीं से हुई थी — लाल कोट और क़िला राय पिथौरा से। यहीं से पृथ्वीराज चौहान ने राज किया, और यहीं से कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली सल्तनत के पहले ग़ुलाम वंश की नींव रखी। जब मुहम्मद गोरी ने दिल्ली जीती और वापस चला गया, तब दिल्ली की जिम्मेदारी कुतुबुद्दीन ऐबक को सौंपी गई। उसने लाल कोट के भीतर से ही शासन शुरू किया, और यहीं से भारत में मुस्लिम शासन का एक नया दौर शुरू हुआ।
आज जो इलाका मेहरौली के नाम से जाना जाता है, वह उसी ऐतिहासिक किले — लाल कोट और क़िला राय पिथौरा — के अवशेषों पर बसा है। यही कारण है कि मेहरौली को दिल्ली का पहला ऐतिहासिक शहर कहा जाता है। यहां आज भी किले की टूटी दीवारें, पत्थर की बुर्ज़ें और खंडहर मौजूद हैं, जो उस दौर की गवाही देते हैं। इसी क्षेत्र में स्थित है विश्वप्रसिद्ध क़ुतुब मीनार, जिसे कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाना शुरू किया था और उसके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने पूरा किया।
क़ुतुब मीनार न सिर्फ इस्लामी स्थापत्य का अद्भुत उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि दिल्ली में उस समय शासन व्यवस्था कितनी संगठित और प्रभावशाली थी। इस तरह मेहरौली, केवल एक इलाका नहीं, बल्कि दिल्ली के जन्म और सल्तनत काल की नींव का गवाह है। यदि आप दिल्ली को समझना चाहते हैं, तो इसकी शुरुआत यहीं से होती है — लाल कोट की दीवारों और क़ुतुब मीनार की ऊँचाई से।




