दिल्ली के पहले सूफी संतों में से एक हज़रत हाजी रोज़बीह
दिल्ली के मेहरौली में स्थित लगभग 800 साल पुरानी हज़रत रोज़ी बाबा दरगाह, जिन्हें हाजी रोझबिह भी कहा जाता है, को DDA ने 2024 में अवैध निर्माण बताकर गिरा दिया। जानिए कौन थे हज़रत रोज़ी, वे कहां से आए थे, कैसे वे दिल्ली के सबसे पहले सूफी संतों में से एक बने, और कैसे हज़रत रोज़ी बाबा दरगाह, जो संजय वन की शांत फिजाओं में बसी थी, अब इतिहास बन चुकी है। यह लेख दिल्ली की सूफी विरासत, DDA द्वारा की गई Mehrauli Dargah Demolition, और सूफी संत हज़रत रोज़ी बाबा की रूहानी यात्रा पर प्रकाश डालता है।
दिल्ली की ज़मीन, खासकर मेहरौली का इलाका, सदियों से सूफियों और रूहानियत की खुशबू से महकता रहा है। इन्हीं सूफी संतों में एक नाम हज़रत रोज़ी बाबा का भी है, जिन्हें लोग हाजी रोझबिह के नाम से जानते हैं। माना जाता है कि वे 12वीं सदी के आखिर में दिल्ली आए थे और उन्हें दिल्ली के सबसे पुराने सूफी संतों में गिना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि हज़रत रोज़ी बाबा अफगानिस्तान या मध्य एशिया से दिल्ली पहुंचे थे। उस समय दिल्ली पर राजा पृथ्वीराज चौहान (राजा पिथौरा) का शासन था।
वे मेहरौली के पास स्थित ‘लालकोट’ के नज़दीक एक शांत गुफा में इबादत करने लगे। उनका मकसद था – लोगों को सच्चाई, इंसानियत और खुदा की राह पर चलने की सीख देना। हज़रत रोज़ी बाबा की सादगी और नेक विचारों से लोग इतने प्रभावित हुए कि कई हिंदू भी उनके करीब आए और कुछ ने इस्लाम कबूल कर लिया। एक प्रचलित कहानी के मुताबिक, राजा के परिवार की एक महिला हज़रत रोज़ी बाबा की बातों से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया था। हज़रत रोज़ी बाबा के इंतकाल के बाद, उसी गुफा के पास उनकी मजार बनाई गई, जो अब ‘दरगाह’ के नाम से जानी जाती थी। यह दरगाह लगभग 800 साल से वहां मौजूद थी और 1922 में भारतीय पुरातत्व विभाग (ASI) की सूची में इसका उल्लेख भी हुआ था। माना जाता है कि यह दिल्ली की सबसे पुरानी सूफी दरगाहों में से एक थी।
दरगाह का स्थान
हज़रत रोज़ी बाबा की दरगाह किला राय पिथौरा की दीवारों के पास बने ऐतिहासिक ‘फतह बुर्ज’ के करीब स्थित थी। यह दरगाह बेहद सादी और शांत थी — सफेद रंग से पुती हुई और प्लास्टर से ढकी हुई। इसकी सादगी ही इसकी असल खूबसूरती थी, जो रूहानियत और तवाज़ो का प्रतीक मानी जाती थी।
दरगाह को क्यों और कब तोड़ा गया?
जनवरी 2024 के आखिरी दिनों में दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने मेहरौली के संजय वन इलाके में अतिक्रमण हटाने का एक अभियान शुरू किया। इसी दौरान सैकड़ों साल पुरानी हज़रत रोज़ी बाबा की दरगाह को भी तोड़ दिया गया। DDA का कहना था कि यह दरगाह सरकारी ज़मीन पर बनी थी और वह इलाका फॉरेस्ट रिजर्व (जंगल क्षेत्र) में आता है, जहां किसी भी तरह का धार्मिक निर्माण कानून के खिलाफ है। उनका यह भी कहना था कि उन्होंने यह कार्रवाई धार्मिक मामलों की समिति (Religious Committee) से मंज़ूरी लेकर की। लेकिन दरगाह तोड़े जाने के बाद लोगों में बहुत ग़ुस्सा और दुख देखने को मिला। आसपास के मुस्लिम समुदाय, धार्मिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि यह दरगाह कोई आम इमारत नहीं थी, बल्कि आस्था, इतिहास और रूहानियत की एक ज़िंदा मिसाल थी।
इतिहास मिटता है तो यादें रोती हैं
हज़रत रोज़ी बाबा सिर्फ एक सूफी संत नहीं थे, बल्कि वो उन लोगों में से थे जिन्होंने दिल्ली में सूफी परंपरा की शुरुआत की थी। उनकी दरगाह एक रूहानी जगह थी, जहां लोग सुकून और दुआ के लिए आते थे। जब DDA ने इस दरगाह को गिरा दिया, तो एक बड़ा सवाल सामने आया — क्या हम अब अपने इतिहास और आस्था की कद्र करना भूल गए हैं? क्या अब किसी की आस्था सिर्फ कागज़ों में लिखे नियमों से तय होगी? ऐसी दरगाहें सिर्फ इमारतें नहीं होतीं, ये हमारे अतीत, हमारी संस्कृति और हमारी पहचान का हिस्सा होती हैं। हमें चाहिए कि इन जगहों को जमीन का टुकड़ा मानकर ना हटाया जाए, बल्कि इन्हें धरोहर मानकर संभाला जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपने इतिहास को जान सकें और उससे जुड़ सकें।




