सियार-उल-औलिया: चिश्ती संतों की रूहानी ज़िंदगी की किताब
सियार-उल-औलिया” चिश्ती सूफी सिलसिले की सबसे अहम किताबों में से एक है, जिसे सय्यद मुहम्मद बिन मुबारक किरमानी ने फ़ारसी में लिखा था। इसमें हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया समेत कई सूफी संतों की रूहानी ज़िंदगियों का ज़िक्र मिलता है। जानिए इसकी खासियत, इतिहास और मेरी एक मुलाक़ात इस किताब से।
एक किताब से रूहानी मुलाक़ात
कुछ किताबें पढ़ी नहीं जातीं, बल्कि महसूस की जाती हैं। ऐसा ही एक अनुभव मुझे जामिया मिल्लिया इस्लामिया के इस्लामिक स्टडीज़ डिपार्टमेंट में हुआ, जहाँ एक पुरानी लेकिन मुकद्दस किताब मेरी नज़र से गुज़री—”सियार-उल-औलिया”। उस वक़्त मैंने इसे खोला नहीं, लेकिन इसके नाम ने मुझे अपनी तरफ़ खींच लिया। जब नाम पढ़ा और घर जाकर इसके बारे में खोजा, तो मानो एक रूहानी दरवाज़ा खुल गया।
सियार-उल-औलिया क्या है?
“सियार-उल-औलिया” एक पुरानी और रूहानी किताब है, जिसमें चिश्ती सूफी संतों की ज़िंदगी की कहानियाँ लिखी गई हैं। इस किताब को सय्यद मुहम्मद बिन मुबारक किरमानी ने लिखा था, जो हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के ज़माने के थे। यह किताब उस समय लिखी गई थी जब दिल्ली में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की रूहानी बैठकों का दौर चल रहा था। इसी वजह से इस किताब में उनके बारे में काफी बातें मिलती हैं।
इतिहास की झलक
“सियार-उल-औलिया” की शुरुआत होती है हज़रत हसन बसरी (रह.) से, जो ताबेईन में से थे और रूहानियत के पहले मशहूर नामों में शुमार किए जाते हैं। इसके बाद यह किताब हमें ले जाती है:
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हज़रत इब्राहीम बिन अदहम
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हज़रत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती
- हज़रत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी
- हज़रत बाबा फरीद
- और फिर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया तक
यह किताब सूफी सिलसिले की आध्यात्मिक विरासत को एक सुनहरी ज़ंजीर की तरह जोड़ती है।
किताब किस भाषा में है और इसका अनुवाद
सियार-उल-औलिया” पहले फ़ारसी भाषा में लिखी गई थी, जो उस ज़माने में पढ़ाई-लिखाई और दरबार की भाषा होती थी। अब इस किताब का अनुवाद (translation) कई दूसरी भाषाओं में हो चुका है, जैसे:
- हिंदी
- उर्दू
- अंग्रेज़ी
ताकि ज़्यादा लोग इस किताब को पढ़ सकें और सूफियों की रूहानी बातें समझ सकें। आज यह किताब कई लाइब्रेरियों, इस्लामिक बुक स्टोर्स और ऑनलाइन PDF फॉर्मेट में भी मिल जाती है।
कहाँ मिलेगी ये किताब?
आप इसे Amazon, Dar-us-Salam, या Local Islamic Bookstores से ख़रीद सकते हैं।
एक रूहानी सफर की शुरुआत
“सियार-उल-औलिया” कोई आम किताब नहीं है। यह एक ऐसा ज़रिया है जिससे हम उस दौर के रूहानी लोगों की ज़िंदगी, उनकी इबादत, और उनकी मोहब्बत-भरी तालीमों से वाक़िफ़ हो सकते हैं। मैंने भले अभी इसे पढ़ा नहीं है, लेकिन इसका नाम पढ़ते ही जो कशिश महसूस हुई, वह किसी किताब का नहीं, बल्कि एक संत की पुकार जैसी लगी। शायद अल्लाह ने ही मुझे इशारा किया हो कि अब इस रूहानी रास्ते पर थोड़ा और आगे बढ़ो।




