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हज़रत मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह

हज़रत मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह

आज हम जानेंगे हज़रत मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह अजमेर शरीफ के बारे में – वे कौन थे, दरगाह किसने बनवाई, वहाँ कैसे जाएं और वहाँ क्या-क्या देखने को मिलता है। यह दरगाह राजस्थान के अजमेर शहर में है और सूफी संत ग़रीब नवाज़ की याद में बनाई गई है। यहाँ हर धर्म के लोग मन्नत माँगने आते हैं। इस ब्लॉग में आपको दरगाह का इतिहास, उसकी बनावट, उर्स के समय का माहौल, मुग़ल बादशाहों का योगदान और आसपास घूमने की जगहों के बारे में जानकारी मिलेगी।

हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती कौन थे?

हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह का जन्म 1141-42 ईस्वी में ईरान के सिस्तान नामक इलाके में हुआ था। वे बचपन से ही शांत स्वभाव, दयालु और रूहानी प्रवृत्ति के इंसान थे। 52 वर्ष की आयु में उन्होंने सूफी संत शेख उस्मान हरवानी से आध्यात्मिक तालीम और खिलाफ़त प्राप्त की। इसके बाद वे हज के लिए मक्का और मदीना शरीफ गए। मदीना में एक रूहानी अनुभव के दौरान उन्हें यह आदेश मिला कि वे हिंदुस्तान के अजमेर शहर जाएँ और वहां मानवता, मोहब्बत और भाईचारे का पैग़ाम फैलाएं। उन्हें न तो रास्ता पता था और न ही वह जगह कहाँ है, इसका अंदाज़ा था, लेकिन उन्होंने अल्लाह पर भरोसा रखा। वे बगदाद, लाहौर होते हुए दिल्ली पहुँचे और फिर अजमेर चले आए।

दरगाह का इतिहास – कब बनी और किसने बनवाई?

दरगाह का इतिहास – कब बनी और किसने बनवाई

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह पर इतिहास में कई बड़े शासक आ चुके हैं। मुहम्मद बिन तुगलक, शेरशाह सूरी, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ, दारा शिकोह, जहाँआरा बेगम और औरंगज़ेब जैसे नाम शामिल हैं, जो अजमेर शरीफ में ख्वाजा साहब की मजार पर आकर दुआ मांगते थे। अकबर बादशाह तो मान्यता के अनुसार फतेहपुर सीकरी से पैदल चलकर दरगाह तक पहुंचते थे। आज भी देश और दुनिया से लोग यहां आते हैं 

चाहे वे नेता हों, फिल्म कलाकार हों, व्यापारी हों या आम लोग। सब ख्वाजा गरीब नवाज़ की मजार पर चादर चढ़ाकर अपने दिल की मुरादें मांगते हैं। जानी-मानी किताब “Sufi Martyrs of Love” में इतिहासकार कार्ल डब्ल्यू अर्न्स्ट और ब्रूस बी लॉरेंस ने बताया है कि शुरू में ख्वाजा साहब की मजार सिर्फ लकड़ी की बनी हुई थी। बाद में इसमें पत्थर की छतरी जोड़ी गई। जब 1455 ईस्वी में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी ने अजमेर को अपने अधीन किया, तब तक दरगाह पर कोई ठोस इमारत नहीं बनी थी। बाद में इसे सुंदर और मज़बूत रूप दिया गया, और आज यह जगह सिर्फ एक मजार नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का रूहानी केंद्र बन चुकी है।

सूफी परंपरा और उर्स

  • हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह का उर्स हर साल इस्लामी महीने ‘राज़ब’ की 1 से 6 तारीख के बीच मनाया जाता है।

  • “उर्स” का मतलब होता है “विलीन होना” — यानी जब कोई सूफ़ी संत दुनिया से रुख़्सत होकर अल्लाह से जा मिलता है। इसे “शादी” या “मिलन” के रूप में देखा जाता है।

  • अजमेर शरीफ में यह उर्स छह दिन तक चलता है और इसमें देश-विदेश से लाखों ज़ायरीन (श्रद्धालु) आते हैं।

  • इस दौरान दरगाह को रोशनी से सजाया जाता है, कव्वालियाँ, महफ़िल, और लंगर होते हैं।
दरगाह को दान और निर्माण कार्य
  • 1532 ई. – दरगाह का सफेद संगमरमर का गुंबद बनवाया गया (उत्तरी दीवार पर सुनहरे अक्षरों में अंकित)।
  • रामपुर के नवाब हैदर अली खानगुंबद पर कमल और सोने का मुकुट दान किया।

  • जहाँआरा बेगम (शाहजहाँ की बेटी),  बेगुमी दालान बनवाया (दरगाह के बाएं ओर),  रेलिंग दान की (कब्र के चारों ओर)।, बेगुमी चबूतरा बनवाया। 
  • जहाँगीर – कब्र के चारों ओर चांदी के चार खंभों वाली मोती और चांदी की छतरी बनवाई।
  • 1911 ई. – हैदराबाद के निज़ाम मीर उस्मान अली खानमुख्य द्वार (निज़ाम गेट) दान किया।
  • शाहजहाँशाहजहानी गेट दान किया जो बुलंद दरवाज़े के आगे परिसर का विस्तार दर्शाता है।
  • सुल्तान महमूद खिलजीबुलंद दरवाज़ा बनवाया।
  • 1568 ई. – अकबर चित्तौड़गढ़ युद्ध जीतने पर विशाल डीग (कड़ाहा) दान किया
  • टेक की रानी मैरी (1911)पानी का कुंड (झालारा) दान किया।

अजमेर शरीफ दरगाह, राजस्थान के अजमेर शहर में स्थित है।

हवाई मार्ग:

सबसे नज़दीकी एयरपोर्ट जयपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, जो अजमेर से लगभग 135 किलोमीटर दूर है। वहां से टैक्सी या बस से अजमेर पहुँचा जा सकता है।

रेल मार्ग:

अजमेर जंक्शन भारत के सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। स्टेशन से दरगाह सिर्फ 1.5 किलोमीटर दूर है। आप पैदल, ऑटो या रिक्शा से जा सकते हैं।

 सड़क मार्ग:

दिल्ली, जयपुर, जोधपुर, कोटा जैसे शहरों से अजमेर के लिए बस और टैक्सी सेवा उपलब्ध है। NH-8 के ज़रिए अजमेर तक पहुंचना आसान है।

अजमेर शरीफ दरगाह सिर्फ एक मज़ार नहीं है – यह एक रूहानी अनुभव है। यहाँ आकर इंसान अपने ग़म भूल जाता है और दिल को सुकून मिलता है। हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की तालीमें आज भी उतनी ही असरदार हैं, जितनी सदियों पहले थीं। अगर आपने अभी तक इस पवित्र जगह की ज़ियारत नहीं की है, तो एक बार ज़रूर जाएं।  

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