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ग्रेटर नोएडा के कासना गांव में स्थित इकराम खान का मकबरा

ग्रेटर नोएडा के कासना गांव में स्थित इकराम खान का मकबरा

कासना गांव में एक शांत पार्क के कोने में छिपी है एक ऐसी विरासत, जिसे शायद ही कोई जानता हो। एक टूटा-फूटा मकबरा… और उसके अंदर दफ़्न है मुग़ल इतिहास का एक गुमनाम चेहरा — इकराम खान। कौन थे ये? क्यों उनका नाम लाल किले से जुड़ा है? और उनका मकबरा आज इतनी बुरी हालत में क्यों है? आइए, जानते हैं इस भूली-बिसरी कहानी को।

कासना गांव का एक अनसुना इतिहास

ग्रेटर नोएडा के कासना गांव को लोग आज एक तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्र के रूप में जानते हैं, लेकिन यहां एक ऐसा ऐतिहासिक मकबरा मौजूद है जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। यह मकबरा है इकराम खान का, जो मुग़ल सम्राट शाहजहां के एक महत्वपूर्ण अधिकारी थे।

इकराम खान कौन थे?

इकराम खान मुग़ल बादशाह शाहजहां के समय एक बड़े और भरोसेमंद अफसर थे। उन्हें दिल्ली के मशहूर लाल क़िले को बनवाने की ज़िम्मेदारी दी गई थी। यह किला आज भी भारत की सबसे खास ऐतिहासिक इमारतों में गिना जाता है। इकराम खान बादशाह के बहुत क़रीबी माने जाते थे और उन्हें इमारतें बनवाने का अच्छा अनुभव था। उनकी निगरानी में कई बड़े निर्माण हुए, जिनमें सबसे अहम लाल क़िला है।

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कासना पार्क में स्थित उनका मकबरा

इकराम खान का मकबरा ग्रेटर नोएडा के कासना गांव में एक पार्क के अंदर स्थित है, जिसे लोग “कासना पार्क” के नाम से जानते हैं। कभी यह मकबरा बहुत खूबसूरत और मजबूत रहा होगा, लेकिन आज इसकी हालत काफी खराब हो चुकी है। दीवारों में दरारें हैं और चारों तरफ टूट-फूट नजर आती है। सबसे दुख की बात यह है कि वहां कोई जानकारी देने वाला बोर्ड या निशान भी नहीं है, जिससे आम लोग समझ सकें कि यह जगह कितनी ऐतिहासिक और खास है।

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कैसे पहुंचें कासना गांव?

कासना गांव ग्रेटर नोएडा में स्थित है, जहां आप आसानी से कार, बाइक या लोकल ऑटो के ज़रिए पहुँच सकते हैं। नोएडा सिटी सेंटर या ग्रेटर नोएडा वेस्ट से यह दूरी ज़्यादा नहीं है। अगर आप मेट्रो से आना चाहें तो नज़दीकी मेट्रो स्टेशन Knowledge Park II (एक्सटेंशन लाइन) है, जहां से ऑटो या रिक्शा लेकर कासना पार्क आसानी से पहुँचा जा सकता है।

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गिरती हुई विरासत – संरक्षण की ज़रूरत

गिरती हुई इस विरासत की हालत देख कर दिल दुखता है। मकबरे की दीवारों में गहरी दरारें हैं और इसकी छत किसी भी वक्त गिर सकती है। ऐसा लगता है जैसे यह ऐतिहासिक इमारत बिना किसी देखभाल या मरम्मत के बस समय के साथ खुद ही ढह जाएगी। यह अफ़सोसजनक है कि एक ऐसा व्यक्ति जिसे मुग़ल इतिहास में इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी मिली थी, उसकी यादें आज गुमनामी और लापरवाही का शिकार हो रही हैं। इस धरोहर को जल्द से जल्द संरक्षण की ज़रूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इसे देख सकें और इसके इतिहास से जुड़ सकें। 

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