Select Page

अजमेर में हज़रत क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी का चिल्ला

अजमेर में हज़रत क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी का चिल्ला

आज हम आपको अजमेर की एक रूहानी और पुरसुकून जगह पर लेकर चलेंगे, जहाँ हज़रत क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी रहमतुल्लाह अलैह ने अल्लाह की याद में इबादत और तन्हाई (एकांत) में वक्त गुज़ारा था। इस मुक़द्दस जगह को उनका “चिल्ला” कहा जाता है — जहाँ उन्होंने रूहानी तालीम और ज़िक्र में वक्त बिताया। यह जगह सूफ़ी परंपरा, फिक्र (सोच) और तस्सवुफ़ (आध्यात्म) की एक खूबसूरत मिसाल है।

कौन थे हज़रत क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी?

हज़रत क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी रहमतुल्लाह अलैह चिश्ती सिलसिले के पहले बड़े सूफ़ी संतों में से थे। उन्हें दिल्ली का पहला सूफ़ी क़ुतुब माना जाता है। उनका जन्म 1173 ईस्वी में ओश (आज का किर्गिज़स्तान) में हुआ था। उन्होंने बग़दाद में पढ़ाई की और हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी रहमतुल्लाह अलैह के खास शागिर्द और ख़लीफ़ा बने। बाद में वह दिल्ली आ गए और महरौली में रहकर लोगों को अल्लाह की याद, सादगी और मुहब्बत का पैग़ाम देने लगे। “काकी” नाम उन्हें एक करामत की वजह से मिला — जब बिना किसी वजह के उन्हें हर रोज़ अल्लाह की तरफ़ से रोटी (काक) मिलती थी। 1235 ईस्वी में एक समा महफ़िल के दौरान वज्द की हालत में उनका इंतक़ाल हुआ। आज उनकी दरगाह महरौली में है, जो दिल्ली की सबसे पुरानी और पाक दरगाहों में मानी जाती है।

चिल्ला क्या होता है?

सूफ़ी परंपरा में “चिल्ला” एक ऐसी जगह होती है जहाँ कोई सूफ़ी संत अकेले बैठकर इबादत, ध्यान और ख़ुदा की याद में वक़्त बिताता है। ये जगहें आमतौर पर शांत, एकांत या पहाड़ी इलाकों में होती हैं। चिल्ला उस समय को दिखाता है जब संत दुनियावी चीज़ों से दूर होकर सिर्फ अल्लाह से जुड़ने की कोशिश करते हैं।

अजमेर में यह चिल्ला कहाँ है?

हज़रत क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी रहमतुल्लाह अलैह का चिल्ला अजमेर में हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह के क़रीब ही एक पुरसुकून कोने में स्थित है। यह जगह बेहद सादा लेकिन रूहानी है, जहाँ स्थानीय लोग अदब और मोहब्बत के साथ हाज़िरी देने आते हैं |                           

Google Map का लोकेशन

qutbuddin-ka-chillah-ajmer

हज़रत क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी रहमतुल्लाह अलैह का चिल्ला अजमेर की एक ऐसी पवित्र जगह है जहाँ रूहानियत, सादगी और खुदा से जुड़ाव की खुशबू आज भी महसूस होती है। अगर आप कभी अजमेर शरीफ ज़ियारत के लिए जाएं, तो इस चिल्ले की हाज़िरी ज़रूर दें। यह जगह न सिर्फ इतिहास से जुड़ी है, बल्कि आपके दिल और रूह को भी सुकून देती है।

About The Author